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Thursday, March 18, 2010


मन की वीरानियों मैं तेरा ख्याल है या
कोई सूखे पत्तों पे चल रहा है !
ये मेरी आँख छलक आई है या
चाँद मेरे गम से पिघल रहा है !
ये चांदनी पत्तों पे ढल रही है या
तेरी याद का जुगनू चमक रहा है !
ऐ बादल आज जम के बरस जा
किसी के साथ रोने को दिल मचल रहा है 1
मोंत मेरी जिंदगी से अच्छी निकली
वो साथ जनाज़े के मेरे चल रहा है !
aabhaar sahit
avenindra maan

Monday, February 22, 2010

azeez


मेरे ज़ेहन ने सम्हाल रखे हैं मेरी रूह के टुकड़े

वर्ना ये साथ रिश्तों के दफ़न हो गए होते

मेरे ख्वाबों के दामन पे दाग लग चुके बहुत

वर्ना ये अजीजों का कफ़न हो गए होते

Thursday, February 18, 2010


दिल कि जला के आग बुझाते क्यूँ हो

आये थे मेरे पास तो जाते क्यूँ हो

बेहतर तो था कह देते हमसे इश्क नहीं है

मेरे ख्वाबों को मजबूरियां दिखाते क्यूँ हो

जिस बात ने हमको कहीं का ना छोड़ा

हर वक़्त उसी बात पे आते क्यूँ हो

मौत के रहम ने आज नींद बक्श दी

सोने दो मान को अब जागते क्यूँ हो

Wednesday, February 17, 2010

दुखती रगों पे हाथ रखने लगे हैं लोग

छु छु के मेरा दर्द परखने लगे हैं लोग

सब कुछ लुटा चूका हूँ दीन भी ईमान भी

अब क्यूँ मेरे जीवन पे भी झपटने लगे हैं लोग

कमजर्फ ज़ज्बातों को नंगा देखकर

हकों के भरी पेर पटखने लगे हैं लोग
इक दर्द हो तो कह जाएँ
aनगीन हो तो कहना क्या है
फ़िर जो अपना है हर उस अपने पर
हर पल व्यर्थ सिसकना क्या है
अपने बाजू पे सर रखने कि इजाज़त दे दो

इस दिल को धड़कने कि इजाज़त दे दो

ज़ख्मों के सिलसिलों ने कभी रोने ना दिया

अपने दामन मैं बिलखने कि इजाज़त दे दो

हिन्द-युग्म: एक और इम्तिहान है-गज़ल

फिर मुझे टूटना है बिखर जाना है



कितना संगदिल ये ज़माना है


कहते हैं रौनक है आज मैखने मैं


मेरे हाथों मैं तो टूटा हुआ पैमाना है