
दिल कि जला के आग बुझाते क्यूँ हो
आये थे मेरे पास तो जाते क्यूँ हो
बेहतर तो था कह देते हमसे इश्क नहीं है
मेरे ख्वाबों को मजबूरियां दिखाते क्यूँ हो
जिस बात ने हमको कहीं का ना छोड़ा
हर वक़्त उसी बात पे आते क्यूँ हो
मौत के रहम ने आज नींद बक्श दी
सोने दो मान को अब जागते क्यूँ हो
No comments:
Post a Comment