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Sunday, March 21, 2010


पीड़ा
तो इक सिला है ,,,,,,

जो विरलों को ही मिलता है

जीवन
उसको ही कहते हैं

जो दुःख दर्दों में पिसता है

वेरना

धुप छाँव जीवन की

कभी न उतरे सांस मुंडेरे

या तो उजियारे हो जग में

या फिर छाए रहे अँधेरे

आती है रात चली जाती है

प्रात विहँसता दिन ढल जाता है

कई बार हँसते हँसते ही

साँसों में दर्द भी मिल जाता है


कई बार हँसते हँसते ही सांसो में दर्द भी मिल जाता है
अवनींद्र

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