
तू
कहाँ से आके
बैठ गयी .....?
मेरे
मरुस्थल से जीवन मैं
एक
एकाकी पौधे कि तरह ...!
जबकि
ज्ञात है तुम्हे ......१
यहाँ
उम्मीद कि कोई बूँद नहीं
न ही नमी है
हवाओं मैं
न ही
धरती इतनी सख्त है
कि कदम सीधे पड़े
गर्म इतनी कि
तमन्नाएं झुलस जाती हैं
सर्द इतनी कि
तन्हाईयाँ भी
काँप जाती हैं ......!
बरसों से इस मरुस्थल मैं
मूक है हर दिशा ..........!
झुलसी हुई रूह >>>>
झंझावातों का दर्पण सी है
एकटक आँखें ....
स्वप्नों से निर्धन सी हैं
पत्तों की तेरी ओस से ......
आँख भरू
या....
तर कर लूं गला ..................!
तू कहाँ से आके बैठ गयी
मेरे मरुस्थल से जीवन मैं
एक एकाकी पौधे कि तरह ...?
अवनींद्र
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